वक़्त नूर को बेनूर कर देता है

वक़्त नूर को बेनूर कर देता है,
छोटे से जख्म को नासूर कर देता है,
कौन चाहता है अपनों से दूर रहना,
पर वक़्त सबको मजबूर कर देता है।

मैं तुझे मिलूँ…

मैं चाहता हूँ मैं तेरी… हर साँस में मिलूँ,

परछाईयों में, धूप में, बरसात में मिलूँ।

कोई खुदा के दर पे मुझे ढूंढ़ता फिरे,

मैं भी किसी को प्यार की सौगात में मिलूँ।

तड़पे हजारों दिल मगर हासिल न मैं हुआ,

तू चाहता है मैं तुझे यूँ ही खैरात में मिलूँ।